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धोबी-रजक समाजको अनुसूचित जातीका पूर्ववत आरक्षण तुरंत देना होगा अन्यथा संविधानिक कारवाई का इशारा

धोबी-रजक समाजको अनुसूचित जातीका पूर्ववत आरक्षण तुरंत देना होगा अन्यथा संविधानिक कारवाई का इशारा

 

पुणे, प्रतिनिधी:- 1 मे 1960 को महाराष्ट्र राज्य निर्मिती पूर्व से धोबी-रजक समाज अनुसूचित जाती मे था लेकिन महाराष्ट्र राज्य निर्मिती के बाद धोबी समाज को ओबीसी प्रवर्ग मे डालने से धोबी समाज का हुआ अपरिमित नुकसान मुआवजा नही मिले तो संविधानिक और कानुनकी मदतसे आक्रमक पहल करानेका इशारा ऍड संतोष शिंदे जी ने दिया है |

ब्रिटिश कालसे धोबी समाज अनुसूचित जाती मे था इसका सबूत गव्हर्नमेंट ऑफ द सेंट्रल ग्राव्हीस अँड बरोर एज्युकेशन डिपार्टमेंट,1941 चा लेस्ट ऑफ बॅकवर्ड क्लासेस इन इच डिस्ट्रिक्ट, सी पी अँड बेरार लोकल गव्हर्नमेंट ऍक्ट 1948 चा अधिनियम, गव्हर्नमेंट ऑफ इंडिया ऍक्ट 1935, गव्हर्नमेंट ऑफ इंडिया शेड्युल कास्ट ऑर्डर अन्वये अनुसूचित जाती मे रजक जाती का समावेश किया है| पूर्वापार से धोबी समाज को मिलनेवाला अस्पृश्यताका हीनतापूर्वक बर्ताव को देखते घटनाके शिल्पकार डॉ. बाबासाहब जी ने धोबी जात अनुसूचित जात शेड्युल मे समाविष्ठ की | धोबी समाज को रामायण, ऐतिहासिक काल से मिल रही अस्पृश्यता कि हीनता डॉ. आंबेडकर जीने पूर्व दलित चळवळ ‘किताब मे 19 वे शतक के महार इस प्रकरण मे अंग्रेज ग्रंथकारोने भी अस्पृश्य जातीमे धोबी समाज का उल्लेख किया | और स्केव्हेंजर स्वीपर, लेदर वर्कर, वॉशरमेन आर ट्रिटेड अनटचेबल थ्रू आउट द कन्ट्री, अस्पृश्य कौन और कैसे इस बुक मे धोबी जात क्षुद्र के बाद अंत्यज्ञ है और अतिशूद्र आते है इस्का स्पष्ट उल्लेख किया है | भाषावार प्रांत रचनापूर्व विदर्भ मध्यप्रांत वऱ्हाड के नाम से जाना जाता था | उसी समय वऱ्हाड के भंडारा और बुलढाणा जिले मे धोबी समाज अनुसूचित जातीमे था | सन 1956 मे विदर्भ और गुजरातसह मुंबई राज्य कि निर्मिती के बाद 1 मे 1960 को महाराष्ट्र के निर्मिती के बाद 17 राज्य और 3 केंद्रशासित प्रदेश मे धोबी समाज अनुसूचित जाती मे होकर भी महाराष्ट्र के धोबी जाती को ओबीसी प्रवर्ग मे डालकर अखंड धोबी समाज पर सरकार कि तरफ से जान बुझकर अन्याय करके बडा नुकसान आजतक धोबी समाज के हर व्यक्ती का होने से पिछले 6 दशक से धोबी समाज पूर्ववत अनुसूचित जाती आरक्षण के लिये तडफ रहा है प्रयास करता आया है | परंतु आजतक रजक समाज को न्याय मिला नही यह एक बडी शोकांतिका है | फीलहाल मे धोबी सामाज के युवा, बडे- छोटे, बुजुर्ग, शिक्षित-अल्पशिक्षित आदीं का बडे पैमाणे मे अपरिमित नुकसान हुआ है | इससे समाज के लोगोंको सरकारी खाते मे बडे पद पर, देश कि संसदमे, राज्यकी दोनो सदनमे कार्य करने का मोका धोबी समाज का एस सी का आरक्षण सरकार कि तरफ से खारीज करने से खत्म हुआ है | धोबी समाज को एस सी का आरक्षण पूर्ववत मिलने के लिये मार्च 2001 के अर्थसंकल्पीय अधिवेशनमे डॉ. दशरथ भांडे अभ्यास समिती का गठन किया गया | समितीने 28 फेब्रुवारी 2002 को धोबी जात अनुसूचित जातीमे हि आती है इसके बारे मे 207 पन्नो का अहवाल पुरी स्टडी करके सरकार को दिया | लेकिन डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर संशोधन समिती अर्थात बार्टी ने 1996 साल मे उनके अभ्यास अहवाला मे धोबी समाज को अनुसूचित जाती का दर्जा नही, धोबी समाज अस्पृश्य नही है, इसका ब्योरा देकर आजतक भांडे समिती का अहवाल दुर्लक्षित किया गया यह स्पष्ट हुआ है | वास्तविक रूप मे धोबी समाज नया आरक्षण नही मांग रहा है | लेकिन सरकार कि हुई टेक्निकल गलती कि वजह से सरकार ने खारीज किया हुआ एस सी जाती का पुर्ववत आरक्षणकें लिये धोबी-रजक समाज झगडता रहने से उनका पुरा जीवन- जिंदगी बरबादी के कगार पर है | ब्रिटिश काल से मिला हुआ एस सी आरक्षण और महाराष्ट्र राज्य कि निर्मिती पूर्व डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी द्वारा दिया गया धोबी समाज का अनुसूचित जाती का पूर्ववत आरक्षण तत्काल लागू कराना आवश्यक है | इसके लिये मराठा आरक्षण को लेकरं विशेष अधिवेशन बुलाने कि मांग बहुसंख्यांक जन नेंताओने कि है और उसपर कार्यवाही भी शुरु है | तो डॉ. भांडे समिती द्वारा अभ्यास अहवाल के अनुसार धोबी समाज को अनुसूचित जाती का आरक्षण त्वरित लागू कराने के लिये महाराष्ट्र सरकार द्वारा तुरंत शिफारस केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारी, विभाग, राज्य और केंद्रीय सामाजिक न्याय विभाग को लिखित भेजे | अन्यथा धोबी समाज और समाज बांधवोंका आजतक जानबुजकर किया हुआ नुकसान का मुआवजा के लिये जिम्मेदारोंके विरुद्ध संवैधानिक तौर पर सनदशीर और कानूनन कारवाई करने का इशारा ऍड. संतोष शिंदे जी ने दिया है |

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